Tuesday, December 21, 2021

रूठी कविता


 आज कलम से रूठी कविता
कहीं छुपी मन के कोने।
घूम रही सूनी बगिया में
बीज शब्द के कुछ बोने।

भाव बँधे बैठे ताले में
बोल रहे धीरे-धीरे।
बिम्ब बिखेरे रात चाँदनी
कहती है नदिया तीरे।
शब्द मणी से भरलो झोली
चली चाँदनी अब सोने।
आज कलम से………

रक्तिम छवि लेकर शरमाए
भोर सुहानी मनभावन।
ओस लाज का घूँघट ओढ़े
छिपती है माटी आँगन।
दुविधा के केसों में उलझे
रस लगते आभा खोने।
आज कलम से………

शब्द नचे कठपुतली जैसे
पकडूँ तो भागे डोले।
मन बैरागी बनकर भटके
यादों के पट को खोले।
अंतस किरणें झाँक रही हैं
चढ़ा अँधेरा अब धोने।
आज कलम से………
*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*
चित्र गूगल से साभार

15 comments:


  1. शब्द नचे कठपुतली जैसे
    पकडूँ तो भागे डोले।
    मन बैरागी बनकर भटके
    यादों के पट को खोले।
    बहुत सुंदर।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार ज्योति जी।

      Delete
  2. Replies
    1. हार्दिक आभार नितीश जी।

      Delete
  3. शब्द नचे कठपुतली जैसे
    पकडूँ तो भागे डोले।
    मन बैरागी बनकर भटके
    यादों के पट को खोले।

    कुछ ऐसी ही मनोदशा अपनी भी है
    बेहतरीन सृजन सखी 🙏

    ReplyDelete
  4. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया दी।

      Delete
  5. वाह!!! मनाइए कविता को! बेचारी क़लम कहीं विरह में सूख न जाए!!! अप्रतिम भाव-सौंदर्य!!!

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत दिनों बाद आपको अपने ब्लॉग पर देख बहुत खुशी हुई। हार्दिक आभार आदरणीय।

      Delete
  6. हार्दिक आभार पम्मी जी।

    ReplyDelete
  7. आपकी कलम से न कविता रूठ सकती है और न आपसे शब्द । यूँ बेहतरीन अभिव्यक्ति ।

    ReplyDelete
  8. रक्तिम छवि लेकर शरमाए
    भोर सुहानी मनभावन।
    ओस लाज का घूँघट ओढ़े
    छिपती है माटी आँगन।
    दुविधा के केसों में उलझे
    रस लगते आभा खोने।
    आज कलम से………बहुत ही सराहनीय मन को छूती सरस रचना ।

    ReplyDelete
  9. वाह ! रूठने-मनाने के बाद कविता और भी निखर कर सामने आई है.

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय 🙏

      Delete