Monday, April 8, 2019

पूनम का चाँद

पूनम का चाँद जब भी आता
दिल के ज़ख़्मों को कुरेद जाता
तुझसे जुदा होकर भी
ज़िंदा हूँ यह दर्द पीकर भी

बहुत हसीन थे वो लम्हे 
झील का किनारे गुलमोहर के तले
चाँदनी रात में चाँद को देखते
जगमगाते तारे अम्बर पे सजे

चाँदनी रात की हसीं मुलाकात में
  गीत प्रेम के तुम गुनगुनाते थे
आज भी उस गीत को याद कर
आँखों में नमी आ जाती है

तुम संग जो ख्व़ाब बुने थे मैंने
 बिखर गए वो रेत के जैसे
 ज़िंदगी दिल तोड़कर निकल गई
समझ न पाए ज़िंदगी की पहेली

आज भी सब कुछ वही है
बदल गए तुम न जाने कैसे 
तेरी बेरुखी से उजड़ा गुलमोहर
गुमसुम-सा तबसे खिला भी नहीं


ख्व़ाब जरुर टूटे पर आस बाकी है
मिलने की आस लिए बैठा हूँ
साथ बिताए लम्हों को भूलूँ मैं कैसे
इस याद के सहारे जिंदा हूँ

चाँद की कला-सा प्यार परवान चढ़ा
चाँद की तरह ही अंधेरे में खो गया
ग़म नहीं मुझे जो यह दिल टूटा
गम है बस तेरा साथ छूटा

याद तो तुम्हें भी आती होगी
यह जुदाई तुझको भी तड़पाती होगी
पूनम का चाँद जब तुम देखते होगे
कहीं न कहीं तुझे मुझे याद करते होगे
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

4 comments:

  1. बहुत ही सुंदर रचना....सादर स्नेह सखी

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    1. बहुत बहुत आभार सखी

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  2. वाह बहुत सुन्दर रचना सखी भावातिरेक साफ दिख रहे हैं रचना में।
    अप्रतिम ।

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  3. बहुत सुन्दर रचना सखी
    सादर

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