Tuesday, December 3, 2019

छली-सी खड़ी

 
छली-सी खड़ी थी
अपनों से ठगी थी
जुएँ की लालसा की
बली चढ़ी थी।
बचाने द्रोपदी को
कैसे तुम दौड़ पड़े
रिश्ते बचाने 
हर मोड़ पे खड़े थे
द्रोपदी से भाई का
हर फर्ज निभाया
भरे दरबार में
उसका चीर बढ़ाया।
कहते हैं सब 
तुम दयालु बड़े हो
मगर हे कृष्णा
कहाँ छुपे खड़े हो
नहीं है सुरक्षित
बेटियाँ अब जमी पे
बचा नहीं सको तो
उठा लो धरती से
नहीं है ज़रूरत
अब बहन बेटियों की
न माँ चाहिए
न ममता अब माँ की
चाहिए तो अब सिर्फ
घृणित इरादों की पूर्ति
नहीं दर्द न ममता
अब कोमल कली से
निकलना मुश्किल
मासूमों का गली से
दिखता है केवल अब
तन स्त्रियों का
सरे राह हो रहा
चीर हरण बेटियों का
जिंदा जला
फूँक देते हैं उनको
नहीं कोई इंसान
जो बचाए निर्बल को
है लकड़ी के तिनके
नहीं कोई रक्षक
बने सब धरा पे
नारी तन के यह भक्षक
हरपल यह लुटती
कहीं किसी गली में
अपनों के ही बीच
जा रही छली ये
हे माधव
हे गोविन्द हे त्रिपुरारी
बचा न सको
तो मिटा दो तुम नारी
न रहेगी जननी
न बढ़ेगी सृष्टि
बिगड़ेंगे हालात
बंजर धरा के
अँधेरा बढ़ेगा
रोशनी को मिटा के
***अनुराधा चौहान*** स्वरचित ✍️

10 comments:

  1. वाह।नारी की तार-तार होती आवरू की रक्षा की गुहार लगाती बेहद सटीक और मार्मिक चित्रण।बहुत उम्दा अभिव्यक्ति अनुराधा जी।सादर।

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  2. सटीक यथार्थ ह्रदयस्पर्शी रचना

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  3. बहुत मार्मिक ! चीर-हरण से खुद को बचाने के लिए द्रौपदी को अब ख़ुद ही सुदर्शन चक्र चलाना होगा.

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  4. हार्दिक आभार श्वेता जी

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  5. हृदयस्पर्शी सृजन ,सादर

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  6. बहुत सटीक ...भावपूर्ण सृजन...।

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