Saturday, May 23, 2020

राह काँटो भरी

बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
कदम-कदम पे विपदा घेरे
राह है काँटों भरी।

छिन गया है सुख-चैन सारा
फिर रहे बेसहारा।
भूख-प्यास से व्याकुल होते
मिला न कहीं सहारा।
रोग कोरोना बढ़ रहा है
देख आत्मा भय भरी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।

पग में छाले बहुत पड़े हैं
दूर है मंजिल अभी।
बहता लहु दिल देख रो रहा
छोड़ेंगे न घर कभी।
सोच मजदूर चले अकेले 
अँखियाँ नीर भर डरी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।

रेत पर बने पदचिह्न सारे
कह रहे हैं कहानी।
कुचलते हैं सपने सुनहरे 
कैसी ये मनमानी।
नौनिहाल बेदम से चलते
प्राण परवाह न करी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

17 comments:

  1. धन्यवाद आदरणीय

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  2. हार्दिक आभार आदरणीया

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  3. बहुत सुंदर हृदय स्पर्शी रचना सखी ।

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  4. वाह!!हृदयस्पर्शी रचना सखी ।

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  5. मन के दर्द भरे भाव लिखे बिह बाखूबी ... दिल को छूते हुए ...

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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  6. देश को बनाने वालों की तकदीर में जब ऐसे हालात आते हैं तब संवेदनशील हृदय से ऐसी मार्मिक रचनाएँ आती हैं।

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया

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  7. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26 -5 -2020 ) को "कहो मुबारक ईद" (चर्चा अंक 3713) पर भी होगी,
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    ---
    कामिनी सिन्हा

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  8. पग में छाले बहुत पड़े हैं
    दूर है मंजिल अभी।
    बहता लहु दिल देख रो रहा
    छोड़ेंगे न घर कभी।
    सोच मजदूर चले अकेले
    अँखियाँ नीर भर डरी।
    बड़े जतन से भरी हुई थी
    छलक पड़ी सुख गगरी।
    हृदयस्पर्शी एवं भावपूर्ण अभिव्यक्ति अनुराधा जी ।

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  9. बहुत बढ़िया

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