Poet and Thoughts
Monday, July 27, 2020
पलक आस संजोई
›
बैठ राधिका यमुना तीरे श्याम विरह में रोई। भूल गए मोहे सांवरिया सोच रही है खोई। पनघट सूने सूनी गलियाँ चुप हाथों के कँगना। ...
16 comments:
Wednesday, July 22, 2020
हृदय पीर की धधकी ज्वाला
›
सुलग उठी है आज धरा भी हृदय पीर की धधकी ज्वाला। छायादार विटप मिटा रहा मानव पिए स्वार्थ की हाला। भूकंप,बाढ़,काल खड़ा है प्रलय ...
10 comments:
Friday, July 10, 2020
खेल नियति के
›
अंतर्मन में बहता झरना भावों के पट खोल रहा था। पीर लखन से कह न पाए विरह हृदय को भेद रहा था। राम राम हा राम पुकारे नयन सिया के नीर झर...
4 comments:
चक्रव्यूह का भेद गहरा
›
धूप भी चुभने लगी है साँझ भी चुपचाप जागे। मौन हुए इन रास्तों पे बिखरते सपने अभागे। समय चक्र कैसा चला है चाँद सितारे भी चुप है...
8 comments:
भोर सुहानी (बालगीत)
›
उजियारा पूरब से आए भँवरा गुनगुन गाता है। सोने के रथ बैठ सवारी सूरज हँसता आता है। शीतल ठंडी भोर सुहानी चहक-चहक चिड़ियाँ चहक...
6 comments:
Monday, July 6, 2020
प्रलय का आरंभ
›
क्षण भर में ही काट दिया वृक्ष खड़ा था एक हरा सीमेंटी ढांचा गढ़ने के लिए ये कैसा क्रूर प्रहार किया क्यों अनदेखी कर रहा मानव ...
7 comments:
Sunday, July 5, 2020
आह धरा की
›
कटते तरुवर बढ़ती गर्मी धरती हो रही बीमार। क्रोधाग्नि से भरी प्रकृति कैसे सहे अत्याचार। हरियाली को आज मिटाकर फल रहा कंक्रीट जंगल। ...
6 comments:
‹
›
Home
View web version