Followers

Wednesday, January 13, 2021

चीखकर कहती कलम


 रीतियों के जाल जकड़ा

 कब तक रहेगा जमाना।

लाज का पल्लू पकड़ के

दर्द नारी न पहचाना।

छीन हाथों से किताबें

आज भी करते विदाई।

पीर बेटी जब सुनाती

रीति की देते दुहाई ।

चीखकर कहती कलम यह

पीर कब समझे जमाना।

रीतियों के जाल......


एकजुट होकर चलें अब

आँख पट्टी खोलनी है।

बंद हो शोषण सभी अब

बात सबको बोलनी है।

बोझ बनी कुरीतियों को

आज है जड़ से मिटाना।

रीतियों के जाल.....


अधिकार से वंचित कभी

कोई न अब बेटी रहे।

मान उसको भी मिले फिर

हर्ष की यह गाथा कहे।

संचालिका यह सृजन की

सीख ये सबको सिखाना।

रीतियों के जाल......

©® अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️

चित्र गूगल से साभार



20 comments:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" ( 2008...आज सूर्य धनु राशि से मकर राशि में...) पर गुरुवार 14 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय

      Delete
  2. बेहतरीन रचना

    ReplyDelete
  3. यथार्थ परक सार्थक रचना सखी ।
    मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर सृजन
    सादर

    ReplyDelete
  5. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 15-01-2021) को "सूर्य रश्मियाँ आ गयीं, खिली गुनगुनी धूप"(चर्चा अंक- 3947) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"


    ReplyDelete
  6. समझ वही सकता जिस पर गुजरता
    अंधा बहरा मूक रहे सदा ज़माना

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया दी

      Delete
  7. प्रभावी लेखन ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया

      Delete
  8. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय

      Delete
  9. सचेत औऱ सीख देती बहुत अच्छी रचना
    बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय

      Delete
  10. बहुत सुन्दर

    ReplyDelete