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Monday, August 20, 2018

जीवन का सच

वो क्यों बोला
तू क्यों बोला
हम क्यों बोलें
बस जीवन नैया
भंवर में डोले
उसे क्या करना
तुझे क्या करना
हमें क्या करना
बस इसी में बीते
यह दिन रैना
वो क्यों आया
तू क्यों गया
हम क्यों जाएं
बस इन बातों से
आपस में टकराएं
इसने नहीं देखा
उसने नहीं देखा
हमने नहीं देखा
फिर भी खिच गई
बीच में लक्ष्मण रेखा
क्यों न हम भी करें
तुम भी करो
वो भी करें
आओ हम मिलकर
जीवन सार्थक करें
***अनुराधा चौहान***

Saturday, August 18, 2018

भयावह यह मंजर है

उजड़ते घर बिखरते लोग
प्रभू कैसी यह लीला है
हरे भरे सुंदर केरल को
कैसे विनाश ने घेरा है
कहीं नाम की बारिश
कहीं पर आफत बन बरसे
कुदरत की कैसी लीला
जो इंसां को ही निगले
फसे कई बेजुबान जानवर
बह गए सपने भी सारे
बाढ़ की इस विभीषिका में
उजड़ गए आशियाने भी
किसी के माँ बाप बिछड़े हैं
तो कहीं बच्चे बिलखते हैं
फसी पानी में जिंदगियां
दाने दाने को तरसती हैं
हरियाली से सजे स्वर्ग का
कैसा भयावह यह मंजर है
जिधर तक है नजर जाती
वहां तक दिखता है पानी
आंखों में नमी लेकर
जगह रहने की ढूंढ़े हैं
यह भीषण बाढ़ का मंजर
मेरे दिल को है दहलाता
प्रभू अब रोक दो बारिश
यह विनाश भी थम जाएं
जो बिछड़ी हैं जिंदगियां
वो आपस में मिल जाएं
***अनुराधा चौहान***


Friday, August 17, 2018

मेरा मुझ से परिचय

यह जिंदगी ही है
जो कराती सबका परिचय
इस सुंदर दुनिया से
इस सुंदर प्रकृति से
उस मां की गोद से
जिसने हमें जन्म दिया
यह जिंदगी मुझे मिली
मेरा मुझ से परिचय हुआ
मुझे एक नाम मिला
इस दुनिया से परिचय हुआ
बड़ी कमाल है जिंदगी
जो परिचय कराती
हमें हमारे वजूद से
मिलवाती हमें माँ बाप से
और ढेर सारे रिश्तों से
जब तक जिंदगी रहती
नित नया तजुर्बा देती
और उस प्रभू से
परिचय कराती जो हमें
देता है जिंदगी
हरदम नये मकसद से
हमारा परिचय कराती
हमें एक नाम देती
जिंदगी है तो हम हैं
नहीं है तो कुछ नहीं
धन्य है जिंदगी
जो तु मुझे मिली
कुछ कर गुजरने
की चाहत मिली
तेरे दम से हमें
एक पहचान मिली
***अनुराधा चौहान***

Thursday, August 16, 2018

वो सदा अटल थे

भावपूर्ण श्रद्धांजलि
जिंदगी की धूप छांव में
हरदम वो अटल खड़े थे
मौत से ठान युद्ध
वो अटल जिए थे
न हार कभी मानी थी
न हार कभी मानेंगे
जिंदगी में हरदम
उनके अटल इरादे थे
काल के कपाल पर
गीत नए लिखते थे
साथ सभी के सुख-दुख में
कदम मिलाकर चलते थे
विशाल उनका हृदय था
जलाया आंधियों में दिया था
ऐसे महान व्यक्तित्व को
हरदम उन्होंने जिया था
बोलते थे वो सदा
मौत की उम्र है क्या
मैं जी भर जिया
मैं मन से मरूं
मैं लौटकर फिर आऊंगा
कूच से फिर क्यों डरूं
देख के तूफान की तेवरी तन गई
एक बार फिर उनकी
मौत से थी ठन गई
हारी भले ही जिंदगी की
आज उन्होंने जंग है
पर अपने अटल इरादों से
वो हमारे दिल में अजर अमर है
पूर्व प्रधानमंत्री, महान कवि श्री अटल बिहारी वाजपेई को समर्पित यह कविता
आप भले ही हमारे बीच नहीं हैं पर हमारे दिलों में सदैव रहोगे
भावपूर्ण श्रद्धांजलि 🙏
***अनुराधा चौहान***

Wednesday, August 15, 2018

पूनम का चाँद

पूनम की रात थी
काले बादलों का डेरा था
चाँद की चाँदनी पर
लगा बादलों का पहरा था
फैले घने अंधियारे में
इक अजीब बैचेनी सी
कर रही प्रिय का इंतजार
वो थी कुछ सहमी हुई
देख उसके मन की व्यथा
हवा उसे सहलाने लगी
सन्नाटे को चीरने के लिए
कोई धुन वो गुनगुनाने लगी
अंधेरे को दूर करने
जुगनू भी मंडराने लगे
देख कर यह नजारा
बदली भी सब समझ गई
कर चाँद को आजाद
कुछ दूर वो सरक गई
छिटक चाँद से चाँदनी
धरा को रोशन कर गई
रोशनी में देख किसी साये को
वो जाकर उससे लिपट गई
देख पूनम के चाँद को
वो भी मुस्काने लगी
पूनम की यह रात
पिया मन भानें लगी
***अनुराधा चौहान***

Tuesday, August 14, 2018

जय हिन्द जय भारत

सकल विश्व में भारत की
धर्म ध्वजा फहराएंगे
कर प्रकाशित दीप ज्ञान का
अज्ञान का अंधेरा हटाएंगे
चाहें घिरे प्रलय की घोर घटाएं
सुख का सूरज ले आएंगे
सकल विश्व में भारत माँ की
जय जय गान गाएंगे
जय हिन्द जय भारत
***अनुराधा चौहान***

Sunday, August 12, 2018

कर्मभूमि

वीरों की यह कर्मभूमि
पावन धरती हिंदुस्तान की
वीर शिवाजी वीर प्रताप की
यह पावन कर्मभूमि
यह जननी पृथ्वीराज चौहान की
कण कण में इसके लहू मिला
आजादी के मतवालों का
दूर दूर तक शोर गूंजता था
आजादी के नारों का
भूल गए सब राजगुरु
सुखदेव भगत की कुर्बानी को
हंसते हंसते फांसी चढ़ गए
हार न उन्होंने मानी थी
आजादी के लिए जिए
आजाद ही वह शहीद हुए
ऐसे चंद्रशेखर आजाद की
कुर्बानी कैसे भूल गए
भुला कर उनके उपकारों को
जब आतंकवादियों के
होते जय जयकारे हैं
कुछ बुद्धिजीवी उठकर
उनकी सुरक्षा में आगे आते हैं
गौतम नानक की पुण्यभूमि में
अब हरदम हिंसा होती है
हर रोज किसी कोने में पड़ी
इक बेटी तड़पती मिलती है
कैसे वो अनदेखा करते
उस विधवा के आंसू को
सुहाग जिसका शहीद हुआ
देशप्रेम की ज्वाला में
नित कोख उजड़ती मांओं
नित सूनी होती राखी है
पर सत्ता के मतवालों को
लाज न बिलकुल आती है
अपने घर से बेघर होते
लोग उन्हें नहीं दिखते हैं
आरक्षण के अजगर
नित प्रतिभाओं को डसते है
चलो जगालें अपने दिल में
देशप्रेम की ज्वाला फिर
संस्कारों से करले सुशोभित
अपने प्यारे भारत को
वीरों की इस कर्मभूमि को
फिर से पावन बनाले हम
जय हिन्द जय भारत
***अनुराधा चौहान***