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Thursday, April 18, 2019

ज़िंदगी के पन्ने

आ बैठती हूँ झील के किनारे
चेहरे पर मुस्कान लेकर
रोज टूटती बिखरती हूँ
बीते लम्हों की याद लेकर
जाने किस स्याही से लिखे हैं
मेरी किस्मत के पन्ने
खुशियां आती हैं लौट जाती हैं
मेरी जीवन की दहलीज से
ग़म नहीं है तू नहीं पास
यह तो किस्मत है मेरी
जब भी कुछ अच्छा लिखती हूँ
जिंदगी के पन्नों पर
किस्मत की स्याही अकसर
पन्नों पर बिखर जाती है
फिर से बदरंग ज़िंदगी लिए
मैं खुद को वही पाती हूँ
खुद के हालात को सोचकर
अब रोती नहीं मुस्कुराती हूँ
कितना भी दौड़ लूँ ज़िंदगी में
लौटकर खुद को वही पाती हूँ
यह खाली पन्ने किस्मत के
कब खुशी के गीत लिखेंगे
कब खुशियों के कमल
मन की झील में खिलेंगे
तेरे वादों को याद लेकर अकसर
आ बैठती हूँ झील के किनारे 
इंतज़ार है कि तू आए लौटकर
दिन कट रहे इसी आस के सहारे
***अनुराधा चौहान***

Tuesday, April 16, 2019

दिन बचपन के

हल्ला गुल्ला शोर मचेगा
अब तो सारी दोपहर मचेगा
मोज मस्ती के दिन हैं आए
स्कूल सारे बंद हैं भाई
कापी किताब से पीछा छूटा
मस्ती से अब जुड़ गया नाता 
अब न धूप सताए ना ही अंधेरा
गलियों में हम बच्चों का डेरा
न कोई रोके न कोई टोके
झूमें हम सब मस्ती में होके
अब गोरा हो या काला लल्ला
गलियों में अब मचेगा हल्ला
दिन बचपन के यह बड़े सुहाने
गुजर गए तो फिर नहीं आते
हँसी ठिठोली नाचे गाएं
मासूम लम्हे यह मन को लुभाए
सच्चा मन सच्चा बचपन
न कोई झगड़ा न कोई ग़म
लम्हे ज़िंदगी के सभी हैं अच्छे
बीते दिन जो बचपन के थे सच्चे
छुट्टियों की धूम से खिल उठे मन
बच्चों के सबसे प्रिय हैं यह पल
धूल से सने गंदे बदन
नाचे बेफिक्री से मचाएं हुड़दंग
नहीं चाहिए कोई कीमती खिलौने
खुशियों को हमारी कोई न छीने
आम के पेड़ों पर चढ़कर
तोड़ेंगे अमिया खाएंगे नमक संग
जिएं जी भर कर दिन छुट्टी के
खेले दिनभर धूल-मिट्टी में
***अनुराधा चौहान***

Saturday, April 13, 2019

रात की चौखट पर

रात की चौखट पर
ठिठक कर रुक जाते हैं
मेरी किस्मत के उजाले
दुःख की रात ढलती नहीं
सुख का सूरज आता नहीं
यह कैसी परीक्षा ज़िंदगी की
जब भी उजाले की ओर
बढ़ने लगते हैं मेरे कदम
कहीं से तेरी यादों का झोंका
आकर मुझसे लिपट जाता
बीत जाती है हर रात
तेरी यादों की चारपाई पर
मेरा वक़्त रुका वहीं
अभी भी तेरे इंतज़ार में
रात की चौखट पर
अंधेरे की काली चादर ओढ़
मैं दर्द की लहरों संग मचलता
आँसुओं के समंदर में डूबता
तुम्हें तलाशती आँखें हरपल
मुझे भरोसा आज़ भी है
तू आएगी एक दिन लौटकर
रात की चौखट पर
आज भी बैठकर करता हूँ
मैं तेरा इंतज़ार अक्सर
काश मेरा चाँद आए
चाँदनी के उजाले साथ लेकर
रात की चौखट पर आकर
तारे आस के टिमटिमा दे
भरोसा है मुझे भरोसे पर
मेरी ज़िंदगी में तेरा प्यार
रात की चौखट पार कर
ले जाएगा उजालों की ओर
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, April 10, 2019

एक बेचारा

एक गरीब बेचारा
घर सेे निकला था
रोजी-रोटी तलाशने
जेब में संभाल कर रखे थे
माँ के आँसू,
पिता का आशीष
पत्नी के अरमान
बच्चों की ख्वाहिशें
लिए चंद रुपए
खाई दरबदर की ठोकरें
सच्चाई की दौलत जेब में लिए
मेहनत कर पैसे कमाए
हर काम के लिए
करता औरों की जेब गरम
गरीब के पैसे ख़ाकर
भ्रष्टाचारियों को न आए शरम
सच्चाई हारने लगी
झूठ पांव पसारने लगा
गांव से आया सच्चा इंसान
धीरे-धीरे भ्रष्टाचारी बनने लगा
दोष उसका नहीं 
दोष रसूखदारों का है
पैसे वालों को सारी सुविधाएं
गरीब की कौन सुनता है
धूप में बदन जलाकर
मेहनत कर पसीना बहाते
फिर भी जरुरत पूरी न हो पाए
ना ही बच्चों को पढ़ा पाते
तंगहाली में कब फट जाती जेब
गिरकर मिट्टी के मिल जाते
पत्नी के अरमान
बच्चों की ख्वाहिशें
माँ के आँसू, पिता का आशीर्वाद
करने सबकी जरुरतें पूरी
करने लगा सबकी जी हुजूरी
***अनुराधा चौहान***

Tuesday, April 9, 2019

मैं धर्म हूँ

मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
ज़ख्मी होकर आज पड़ा
अपनों के बीच अपने लिए 
लड़ रहा ज़िंदा रहने के लिए
भूल गए इंसानियत का धर्म
बने आज एक दूसरे के दुश्मन
हाँ मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
ना कोई माना ना कोई मानेगा
एकता थी वजूद मेरा 
बटा हुआ हूँ आज टुकड़ों में
जातियों के नाम पर
नफ़रत के पैग़ाम पर
अंतिम साँंस गिन रहा
मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
मानता है जो मुझे
संवारता जो मुझे
प्रेम बांटता फिरे
उपेक्षित वो इस जहाँ में
अभिशप्त हो जी रहा 
मैं स्वयं के हाल पर
मानव की मानसिकता पर
द्रवित हो उठा आज
अश्रू बहाकर देखता
धरा से मिटते खुद को आज
मैं धर्म हूँ बेबस खड़ा
***अनुराधा चौहान***

Monday, April 8, 2019

पूनम का चाँद

पूनम का चाँद जब भी आता
दिल के ज़ख़्मों को कुरेद जाता
तेरी बेवफ़ाई की चोट सहकर
ज़िंदा हूँ आज भी यह दर्द पीकर

बड़ा खुशगवार था वो मौसम
झील का किनारे गुलमोहर के तले
चाँदनी रात में चाँद तारों को देखते
घर लौटते पंँछी तुमको बहुत भाते थे

साथ हम उनके प्रीत के गीत गाते थे
हाथों में हाथ होंठों पर मुस्कान लिए
कांधे पर सर रखकर कई देखे थे ख्व़ाब हमने
पहाड़ों पर होगा सपनों का घर अपना

सपना ही रह गया अब सपना अपना
रेत के घरौंदे सी तेरी मुहब्बत बिखर गई
मारकर ठोकर तू दिल तोड़कर निकल गई
समझ नहीं पाया मैं किस बात की सजा मिली

आज भी कुछ नहीं बदला सब कुछ वही है
बदल गई तुम कैसे मुझसे क्या भूल हुई
तेरी बेरुखी से गुलमोहर भी उजड़ गया
फेंका था तूने हार अब भी उस पर टंगा हुआ

देख-देख उसको आज भी मैं जीता हूँ
ख्व़ाब जरुर टूटे मिलने की आस लिए बैठा हूँ
तेरे साथ बिताए लम्हों को भूल जाऊं मैं कैसे
आज भी इस दिल में तेरी याद लिए फिरता हूँ

चाँद की कला-सा प्यार मेरा परवान चढ़ा
चाँद की तरह ही एक दिन अंधेरे में खो गया
ग़म नहीं मुझे दिल मेरा जो टूट गया
तू खुश रहें जहाँ रहे बस यही करता दुआ

याद तो तुम्हें भी कभी उन लम्हों की आती होगी
तेरी बेवफ़ाई तुझको भी तड़पाती होगी
पूनम का चाँद जब-जब तेरे सामने आता होगा
कहीं न कहीं तुझे मेरी याद दिलाता होगा
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Sunday, April 7, 2019

वजह थी तेरी बेरुखी

तन्हा तन्हा -सी है अब
यह ज़िंदगी तुम बिन
कुछ यादें कुछ बातें
कुछ लम्हे तेरे वादे
कैसे भूल जाऊं ज़िंदगी
जो ज़ख्म तूने दिए थे
यह दर्द और बेकरारी
छाई जीवन में उदासी
है दामिनी तड़कती
घटाएं शोर करती
हवाओं ने रुख़ है बदला
आई यह रात काली
जो फासले हमारे दरमियान
वजह थी तेरी बेरुखी
मन में मेरे हरपल
यादें तेरी है बसी हुई
मैंने हर अपमान सहा
हर रिश्ते का मान रखा
जब चोट लगी दिल को
बिखर गए सपने सभी
बह गए इन आँसुओं में
इस दिल के सारे भरम
गलतियां तुम्हारी नहीं
विचार हमारे मिले नहीं 
चाह थी सात जन्मों की
संग जीने-मरने की
पर कुछ कदम भी हम
एक-दूजे के साथ न चल सके
  ***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार