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Saturday, October 20, 2018

थाम लो खुशियों का दामन

मन के अथाह सागर में
जब उठती है विचारों की लहरें
फिर बहुत मुश्किल होता है
यादों के भंवर से निकलना
बाहर निकलते हैं तो सिर्फ दर्द
कुछ बिछड़ी यादों के
कुछ टूटे सपनों के
किनारे खड़ी रह जाती है
मीठी यादें संभालने वजूद को
जिंदगी नहीं चलती
यादों के भंवर में डूब कर
यादों को ताकत बनाकर
चलने का नाम ही जिंदगी है
उम्र नहीं रुकती किसी के लिए
रुक जाती है जिंदगी
खुल कर जियो उम्र का सफर 
डूबकर भंवर में मौत ही मिलती
थाम लो खुशियों का दामन
तन्हाइयों को पीछे छोड़ कर
छीन कर वक्त से हसीं लम्हे
महका लो मन का आंगन
वक्त के साथ बदलना ही
जिंदगी की रीत है
स्वीकारना सच्चाई को
यही जीवन से प्रीत है
जो बीत गई सो बात गई
कल को लेकर क्या रोना है
जिंदगी को जीना जी भर के
कल जो होना है सो होना है
***अनुराधा चौहान***

Friday, October 19, 2018

रूठना मनाना


कितना प्यारा था बचपन सुहाना
साथ सखियों के रूठना मनाना
माँ के आंगन की मीठी सी मस्ती
साथ बहनों के हंसी ठिठोली
भाई से लड़ना रूठना मनाना
पापा का प्यार माँ का दुलार
बहुत याद आता वो गुजरा जमाना
मां से रूठना उनका मनाना
आंचल में अपने प्यार से छुपाना
बहुत याद आती है ममता की छांव
खेल कर गोद में जिसके हुई मैं बड़ी
बेटियों की किस्मत मैं तो जुदाई लिखी
छोड़ कर में पीहर चली साजन के घर
छूटा बाबुल का घर छूटा बहनों का संग
अब रूठना मनाना सब सपनों की बात
***अनुराधा चौहान***

सत्य को स्वीकार करें

बेवजह उठते सवालों से
जमाने में फैली बुराईयों से
अब हमको ही लड़ना है
आओ सत्य को स्वीकार करें
कलयुगी कंसों का नास करें
अब न राम आएंगे न ही कृष्णा
हमें ही मारना हैं मन की बुरी तृष्णा
सारे पापों की जड़ हैं यह
हमारे दुखों की वजह हैं यह
इन तृष्णाओं को मन से मिटाकर
मन में करके अटल इरादे
संघर्ष के पथ पर आगे बढ़ते
मन के रावण का करना विनाश
धर्म का रखना दामन थाम
झूठ कभी भी छुपता नहीं
सत्य कभी-भी झुकता नही
आओ मिलजुलकर साथ चलें
अच्छाई से बुराई पर वार करें
कर्त्तव्य की नई राह चुनें
अधर्म का करके हम विनाश
धर्म की करें जय-जयकार
सच्चाई पर अडिग रह कर
मन के रावण का कर दो विनाश
***अनुराधा चौहान***

Tuesday, October 16, 2018

मैं न वजह बनूं

मेरे साथी मेरे हमसफर
मेरा प्यार बनकर
तुम आए हो मेरी जिंदगी में
पूनम का चाँद बनकर
तुम माथे की बिंदिया
मेरा श्रृंगार हो
मेरे मुस्कुराहटों की
वजह भी तुम हो
तुमसे ही मेरी जिंदगी में
आई यह बहार है
मेरे अंधेरे जीवन का
तुम प्रकाश हो
अब राह कितनी भी लंबी
या कांटों भरी रहे
जब हाथ तेरा हो हाथ में
सफर यूं हीं चलता रहे
चाँद के संग जैसे जुड़ी है चाँदनी
साथ मेरा साए सा
तुझ संग जुड़ा रहे
तेरे दु:ख की कभी भी
मैं न वजह बनूं
मुस्कान तेरे चेहरे पे
खिलती सदा रहे
***अनुराधा चौहान***

Monday, October 15, 2018

तुझे मेरी याद आएगी


मेरी अश्कों के मोती 
बहते हैं बार-बार
तुझ संग लगा कर प्रीत 
मेरे दिल का है बुरा हाल
पुकारता है दिल तुझे
एक बार तो आकर मिल मुझे
देख जनाजा अपने प्यार का
टूट कर बिखरे सपनों का
झूठे वादे ओर इकरार का
बिखरती हुईं साँसों को 
अब भी है तेरा इंतजार
मचल रही है रूह जिस्म से
साथ छोड़ जाने को है बेकरार
बेबसी के बादल अब गहराने लगे
आकर एक बार मुझे तू लगाले गले
जिस्म से रूह अब होती जुदा
आ बता दे मुझे हुई क्या खता
तू मिला न गिला है मुझे जिंदगी से
दूर होती हूँ अब मैं तेरी जिंदगी से
अश्क भी सूखते जिस्म भी छूटता
अब तुझ से यह नाता यहीं टूटता
प्रीत मेरी थी मेरे साथ ही मिट जाएगी
जान जाने पर तुझे मेरी याद आएगी
***अनुराधा चौहान*** 

Friday, October 12, 2018

सिमट रहे सबके मन

कोई धुन बनाऊं
या गीत कोई गाऊं
पर सुकून के पल
कहां से लाऊं
कोई कविता लिखूं
या कोई गजल
मन बैचेन रहे हरपल
रहूं धरती पर
देखूं आसमान
पर शांति के पल
नहीं आसपास
दिखावे के दंभ में
डूबा संसार
अपनों के लिए अपनों का
गुम होता प्यार
मोबाइल से चलते
अब सारे रिश्ते
पास होकर नहीं
रहते पास अपने
हकीकत में दुनिया
सिर्फ अपने में ही खोई
फसा मोबाइल में बेचारा मन
लगा जीवन में दीमक बन
सिमट रहें हैं सबके मन
कैसे कोई धुन बने सरगम
***अनुराधा चौहान***

Thursday, October 11, 2018

अजीब सी उलझन

 
जब भी बंद करूं आंखें
तेरा चेहरा नजर आता है
मुझको अब हर घड़ी
तेरा ख्याल आता है
बेकरार करती है मुझे
आंखों की कशिश तेरी
बिखर के न रह जाए
मेरे ख्बावों की यह लड़ी
पूछना चाहती हूं मगर
पूछ नहीं पाती हूं
खुद की उलझनों को
खुद ही सुलझाती हूं
यह वहम है मेरे दिल का
या तू भी मुश्किल में है
या कशिश मेरे प्यार की
तुझे भी महसूस होती है
हो अनजान तुम सच में
या फिर अनजान बनते हो
विचारों की गहराई में
डूबती-उतरती रहती हूं
क्या है तेरे मेरे दरम्यान
यह समझ नहीं पाती  हूं
अजीब सी उलझन में
खुद को फसा पाती हूं
***अनुराधा चौहान***