शब्दकोश की खोल पिटारी
भाव हँसे लेकर अँगड़ाई।
कलम मचलकर मसि में डूबी
बनी कागजों की परछाई।
कलियों के घूँघट को छूकर
सूरज की किरणें मचली।
शून्य पड़ी मन की गागर से
कुछ भाव भरी बूँदे फिसली।
भीग उठा सूखा आँचल यूँ
नयनों ने बारिश बरसाई।
ओढ़ हरित पट सूनी टहनी
मुस्काई अब नव रूप लिए।
रसना रचना बन बोल पड़ी
जैसे बैठी थी होंठ सिए।
अपना निखरा रूप देखकर
कविता फिर से है इठलाई॥
मन वीणा की तान सुनी तो
सुर ताल सजी बगिया महकी।
पवन बसंती के छूते ही
आशा रूपी चिड़ियाँ चहकी।
ओढ़ चुनरिया बिंब रूप में
निखरी कविता की तरुणाई॥
*अनुराधा चौहान'सुधी'*

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 23 एप्रिल, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत ही मनमोहक कविता है यह आपकी अनुराधा जी
ReplyDeleteहार्दिक आभार आदरणीय
Deleteकाव्य रचना का आनंद सहज ही कविता में बिखर रहा है
ReplyDeleteहार्दिक आभार अनीता जी
Deleteबहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteहार्दिक आभार हरीश जी
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