शब्दकोश की खोल पिटारी
भाव हँसे लेकर अँगड़ाई।
कलम मचलकर मसि में डूबी
बनी कागजों की परछाई।
कलियों के घूँघट को छूकर
सूरज की किरणें मचली।
शून्य पड़ी मन की गागर से
कुछ भाव भरी बूँदे फिसली।
भीग उठा सूखा आँचल यूँ
नयनों ने बारिश बरसाई।
ओढ़ हरित पट सूनी टहनी
मुस्काई अब नव रूप लिए।
रसना रचना बन बोल पड़ी
जैसे बैठी थी होंठ सिए।
अपना निखरा रूप देखकर
कविता फिर से है इठलाई॥
मन वीणा की तान सुनी तो
सुर ताल सजी बगिया महकी।
पवन बसंती के छूते ही
आशा रूपी चिड़ियाँ चहकी।
ओढ़ चुनरिया बिंब रूप में
निखरी कविता की तरुणाई॥
*अनुराधा चौहान'सुधी'*

बहुत ही मनमोहक कविता है यह आपकी अनुराधा जी
ReplyDeleteकाव्य रचना का आनंद सहज ही कविता में बिखर रहा है
ReplyDeleteबहुत सुंदर रचना
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