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Friday, August 28, 2020

ढलती शाम

 कुछ करले बातें हम अपनी
यह जग रैन बसेरा है।
कब टूटे साँसों का बंधन
उठ जाए ये डेरा है।

बीत गए हैं कितने सावन
कितने ही मधुमास गए।
क्यों सोचे उनके बारे में 
जो हमको ही भूल गए ।
अब ये पल हम दोनों के है
किस चिंता ने घेरा है।
कुछ कर ले...

बीत रही जीवन की संध्या
दिन अपनों पे वार दिए।
बची हुई गिनती की साँसे
चल हाथों में हाथ लिए।
सब पर खुशियाँ खूब लुटाई
बचा साथ अब तेरा है।
कुछ कर ले....

सुलझाते जीवन की दुविधा
आज कहाँ हम आ बैठे।
जिन्हें लगा रखा सीने से
वो कितने बैठे ऐंठे।
छोड़ पुराने दुख को पीछे
पकड़ हाथ बस मेरा है।
कुछ कर ले.....
***अनुराधा चौहान'सुधी'***

2 comments:

  1. उम्र भर होती रहनी चाहियें बातें ... जीवन की संध्या का क्या पता कब आए ...

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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