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Sunday, April 21, 2019

जीवन के रंगमंच पर

जीवन के रंगमंच पर
देखे हैं अजब तमाशे
पैसे वाले नींद को तरसे
गरीब लेते हैं खर्राटें
जेब भरी है दौलत से
सुकून चेहरे से गायब है
जीवन के इस मंच का
यह कैसा अजीब नायक है
थाली में भोजन हैं छप्पन
किसी में नमक कम है 
तो कहीं कम लगे मक्खन
संतुष्ट नहीं यह किसी बात से
जलते एक-दूजे के आराम से
ग़रीब को देख घिनियाते 
जोकर-सा उनको नचाते
ग़रीब पर जब अत्याचार करते
फ़ख्र बड़ा इस बात पर करते
बनाकर उनको यह कठपुतली
इंसानियत की हदें पार करते
बलवान बड़े यह नायक
इंसानियत को करते घायल 
यह रंगमंच बड़ा पेचीदा है
मरता वही जो सीधा है
सदियों से यह रीत चली आई
निर्बल पर हावी यह दुनिया सारी
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

8 comments:

  1. क्या बात है बहुत सुन्दर सखी
    सादर

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  2. जीवन के रंगमंच पर देखे हैं अजब तमाशे
    पैसे वाले नींद को तरसे गरीब लेते हैं खराटें
    अजीब अनुभूति व प्रस्तुति

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  3. सुंदर प्रस्तुति सखी ।

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  4. ये जिंदगी भी तो तमाशा है ...
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है ...

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  5. वाह .... खूबसूरत अंदाज़

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