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Thursday, June 28, 2018

आखिर क्या खोया है

वो न जाने कहां खोया है
समझ नहीं पाती
जो मेने खोया है
तलाशती रहती
हर घड़ी हर जगह
जो खोया है
उसको ढूंढती
हर घड़ी निगाहें मेरी
हर किसी से पूछती
क्या तुमने पाया है
जो मेने खोया है
पर आखिर जो खोया है
उसे रिश्तों में टटोलती
घर की चारदीवारी में
खोजती फिर रही
बैचेन सी आंखें
सहसा एक एहसास
मन के कोने में
आवाज देता है
तूने जो खोया है
वो यहीं है और कहीं नहीं है
वो तेरे घर में बसा है
घर के कण कण में बसा है
हर रुप,हर रंग में बसा है
प्यार है उसका नाम
जिसे तू खोज रही है
***अनुराधा चौहान***

7 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर ।
    कहीं न कहीं अतृप्त है मन प्यार पाने को और रिक्तता वही प्यार ढूढ रही है। अप्रतिम।

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  2. प्रेम मन केअंदर रहता है उर वहीं मिलता है ...
    दुनिया खोजने बाद सुकून घर ही तो आता है ... लाजवाब ...

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  3. सादर आभार आदरणीय

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