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Saturday, June 11, 2022

व्याधियाँ

 


मेटती सुख क्यारियों से

व्याधियाँ लेकर कुदाली।

क्रोध में फुफकार भरती

जूझती हर एक डाली।


आज बंजर सी धरा कर

कष्ट के सब बीज बोते।

मारती लू जब थपेड़े

चैन के मधुमास खोते।

दंड कर्मों का दिलाने

काल तब करता दलाली।

मेटती सुख....


नीलिमा धूमिल हुई नभ 

विष धुआँ आकार लेता।

रोग का फिर रूप देकर

विष वही उपहार देता।

काटते बोया हुआ सब

भाग्य के बन आज माली।

मेटती सुख....


व्याधियाँ नव रूप लेकर

बेल सी लिपती पड़ी हैं।

हाड़ की गठरी विजय का

युद्ध अंतिम फिर लड़ी है।

श्वास सट्टा हार बैठी

बोलती विधना निराली।

मेटती सुख....

©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️

Saturday, June 4, 2022

तपती वसुंधरा


 मानव बना विनाशक बरती न सावधानी।
यह आपदा बनी अब लीले नदी निशानी॥

सूखे तड़ाग सारे धरती चटक रही है।
यह क्रोध भाव कैसा क्यों बैर नीति ठानी॥

तपती वसुंधरा भी अम्बर निहारती है।
बरसो जरा झमाझम आये घड़ी पुरानी॥

नव पौध रोप कर हम धरती बचा सकेंगे।
जीवन फले धरा पर यह रीत भी निभानी॥

नयना निहारते है प्यासा उड़े पपीहा।
छाए घना अँधेरा बहती पवन सुहानी॥

शीतल समीर छेड़े संगीत जब धरा पर।
घिरती घटा घनेरी अंतस समेट पानी॥

मन झूमते सुधी फिर मुख से हटे निराशा।
बूँदे गिरे टपाटप कहती नई कहानी॥
अनुराधा चौहान'सुधी'✍️
चित्र गूगल से साभार

जीवन चक्र

चमक रहा अम्बर पर नवीन तारा है।
कहीं मिटा धरती से किया किनारा है॥

घटे बढ़े यह जीवन सदैव ऐसे ही।
मरे जिए अरु जन्में प्रवास सारा है॥

प्रताड़ना इस सच की सहे सदा मानव।
विछोह कंटक जैसा सहे बिचारा है॥

अधीर हो मन बैठा पुकारता उसको।
चला गया तन से जो अपार प्यारा है॥

समेट लो अब अंतस प्रकाश यह अपने।
चले चक्र नव प्रभु से प्रबंध न्यारा है।
*अनुराधा चौहान'सुधी'*

Wednesday, June 1, 2022

प्रहरी हमारे

ऊँचा लिए तिरंगा हम थाम के चलेंगे।
यह मान देश का है हम शान से कहेंगे॥

वीरों भरी धरा पर जयघोष गूँजता जब।
झुकता नहीं हिमालय हम भी नहीं झुकेंगे॥

हो रात भी घनेरी अरि घात हो लगाए।
जयघोष भारती का सुनकर सदा डरेंगे॥ 

माता धरा हमारी हम प्राण वार देंगे।
तन से लहू बहे पर हम वार भी करेंगे॥

सुन लो वसुंधरा के सच्चे सपूत सैनिक।
यह धूप में खड़े हो हर वार भी सहेंगे॥

कितनी घनी घटा हो या चंचला डराए।
प्रहरी बने हमारे जय भारती कहेंगे।

कहती सुधी चलें जब यह ओढ़ कर तिरंगा।
तब देख यह विदाई बस अश्रु ही बहेंगे।

*अनुराधा चौहान'सुधी'✍️*
चित्र गूगल से साभार

Monday, May 30, 2022

ओस के मोती


जो सुने गीत हम चले आये।
बाँधकर प्रीत साथ में लाए॥

दो घड़ी पास में जरा बैठो।
बीतती रात रागिनी गाये॥

मौन हो आज पायलें बैठी।
चूड़ियाँ भी न भेद बतलाये॥

चाँद भी रूप ले सजीला सा।
झील को देख आज इतराये॥

छेड़ते राग पात पीपल भी।
मोहिनी गंध ले खुशी छाये॥

ज्यों खिली भोर तो कली फूली।
देखकर रूप भृंग इठलाये॥

तू सुधी बीन ओस के मोती 
धूप के ताप में न उड़ जाये॥
*अनुराधा चौहान'सुधी'✍️*
चित्र गूगल से साभार

Monday, May 9, 2022

कोलाहल हृदय का


 स्वप्न सारे टूट बिखरे
ठेव मन पर जोर लागी‌।
रात भी ढलती रही फिर  
बैठ पलकों पे अभागी।

आस के पग डगमगाते
थक कर न रुक जाए कहीं ।
थाम ले छड़ी चेतना की
कोई शिखर मुश्किल नहीं।
देख कोलाहल हृदय का
हो रहा मन वीतरागी।
स्वप्न सारे....

काल की गति तेज होती
जो रुका वो हारता है।
लक्ष्य को आलस की बेदी
वो हमेशा वारता है।
सत्य आँखें खोलता जब
फिर भ्रमित सी पीर जागी।
स्वप्न सारे....

ज्योति जीवन की बुझाने
तम घनेरा हँस रहा है।
कष्ट यह निर्झर बना फिर
नयन से चुपके बहा है।
साँस अटकी देखकर तब
नींद पलकें छोड़ भागी।
स्वप्न सारे....
©® अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित
चित्र गूगल से साभार

Friday, March 4, 2022

लोभ


काँपते हैं देख कानन
मानवों की भीड़ को।
रोपते तरु काट नित वो
पत्थरों के चीड़ को।

 नित नए आकार लेता   
लोभ का गहरा कुआँ।
घुट रही हर श्वास धीरे
डस रहा जहरी धुआँ।
हँस रहे हैं कर्म दूषित
देख बढ़ती बीड़ को।
काँपते हैं देख....

 भ्रष्ट चलकर झूठ के पथ
नित नई सीढ़ी चढ़े।
धर्म आहत सा पड़ा अब
पाप पर्वत सा बढ़े।
सत्य लड़ने को पुकारे
घटती हुई छीड़ को।
काँपते हैं देख....

छटपटाती श्वास तन में
बाग पथरीले पड़ी।
हँस रही अट्टालिकाएँ
हाल पर उनके खड़ी।
बन पखेरू प्राण उड़ते
जा रहे तज नीड़ को।
काँपते हैं देख....

*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*
चित्र गूगल से साभार
छीड़-मनुष्य के जमघट की कमी।
बीड़- एक पर एक रखे सिक्कों का थाक।