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Tuesday, July 4, 2023

गुरु ज्ञान का उजाला


 गुरु ज्ञान का उजाला बनकर करीब आए।
अज्ञानता भरी मन विज्ञान वो सिखाए।
भटके हुए इस मन में ठहराव कही नहीं था।
सीखे सबक हजारों अंधकार भी मिटाए।

छाए घटा घनेरी चपला हृदय डराए।
सागर सी मन व्यथाएं लहरों सी फनफनाए।
मन कुछ समझ न पाता जब अंधकार छाता।
तब धूप की चमक बन गुरुदेव रास्ता दिखाए।

जीवन की पाठशाला गुरु के बिना नही है।
जीवन की शिक्षा माँ से गुरु पहली बस वही है।
गुरुदेव देव तुल्य हैं यह बात माँ सिखाती।
देते पिता सबक यह गुरु ज्ञान जग सही है।

करते नमन हमेशा हम शीश को झुकाएं।
गुरु के बिना न मानव प्रभु को कभी न पाएं।
दभं तोड़ते हमेशा कटुता हृदय मिटाकर।
बस प्रीत हो हृदय में यह सीख ही सिखाएं।

अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित 


5 comments:

  1. गुरु महिमा का साकार चित्रण ...

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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  2. सुंदर चित्रण

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  3. आपकी कविता पढ़कर मन सचमुच प्रसन्न हो गया। आपने गुरु के महत्व को बहुत सरल, सहज और भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

    अधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
    धन्यवाद!

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