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Saturday, June 11, 2022

व्याधियाँ

 


मेटती सुख क्यारियों से

व्याधियाँ लेकर कुदाली।

क्रोध में फुफकार भरती

जूझती हर एक डाली।


आज बंजर सी धरा कर

कष्ट के सब बीज बोते।

मारती लू जब थपेड़े

चैन के मधुमास खोते।

दंड कर्मों का दिलाने

काल तब करता दलाली।

मेटती सुख....


नीलिमा धूमिल हुई नभ 

विष धुआँ आकार लेता।

रोग का फिर रूप देकर

विष वही उपहार देता।

काटते बोया हुआ सब

भाग्य के बन आज माली।

मेटती सुख....


व्याधियाँ नव रूप लेकर

बेल सी लिपती पड़ी हैं।

हाड़ की गठरी विजय का

युद्ध अंतिम फिर लड़ी है।

श्वास सट्टा हार बैठी

बोलती विधना निराली।

मेटती सुख....

©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️

10 comments:

  1. बहुत सुंदरता से सब कुछ समेट लिया । व्याधियों की कुदाल सुख की क्यारियों को मिटा देती है । हमारे ही कर्मों से प्रदूषण अलग दुखदायी हो रहा है ।।विचारणीय रचना ।

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना रविवार १२ जून २०२२ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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    1. हार्दिक आभार श्वेता जी।

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  3. सचमुच व्याधियों के निरंतर आघात से सट्टा हारने की ही अनुभूति होती है । योग का बल ही ठेल सके अब ।
    सतर्कता ही निदान है ।

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया।

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  4. बहुत सुंदर नव गीत सखी! सामायिक परिस्थितियों की भयावहता दिखाता।
    नवल व्यंजनाएं।

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    1. हार्दिक आभार सखी।

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  5. जैसी करनी वैसी भरनी ! प्रकृति हमारे कुकर्मों का हमको दंड तो देगी ही.

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    1. जी हार्दिक आभार आदरणीय।

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