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Tuesday, June 28, 2022

मौन की यात्रा

मौन ढूँढे नव दुशाला

व्यंजना के फिर जड़ाऊ।

यत्न करके हारता मन

वर्ण खोए सब लुभाऊ।


खो गई जाने कहाँ पर

रस भरी अनमोल बूटी

चित्त में नोना लगा जब

भाव की हर भीत टूटी

नींव फिर से बाँधने मन

कल्पना ढूँढे टिकाऊ।

मौन ढूँढे नव........


भाव का पतझड़ लगा जब

मौन सावन भूलता है।

कागज़ों की नाव लेकर

निर्झरों को ढूँढता हैं।

रूठकर मधुमास कहता

बह रही पुरवा उबाऊ।

मौन ढूँढे नव........


वर्ण मिहिका बन चमकते

और पल में लोप होते।

साँझ ठिठके देहरी पर 

देख तम को बैठ सोते।

लेखनी भी ऊंघती सी 

मौन की यात्रा थकाऊ।।

मौन ढूँढे नव........

*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित*

Saturday, June 11, 2022

व्याधियाँ

 


मेटती सुख क्यारियों से

व्याधियाँ लेकर कुदाली।

क्रोध में फुफकार भरती

जूझती हर एक डाली।


आज बंजर सी धरा कर

कष्ट के सब बीज बोते।

मारती लू जब थपेड़े

चैन के मधुमास खोते।

दंड कर्मों का दिलाने

काल तब करता दलाली।

मेटती सुख....


नीलिमा धूमिल हुई नभ 

विष धुआँ आकार लेता।

रोग का फिर रूप देकर

विष वही उपहार देता।

काटते बोया हुआ सब

भाग्य के बन आज माली।

मेटती सुख....


व्याधियाँ नव रूप लेकर

बेल सी लिपती पड़ी हैं।

हाड़ की गठरी विजय का

युद्ध अंतिम फिर लड़ी है।

श्वास सट्टा हार बैठी

बोलती विधना निराली।

मेटती सुख....

©® अनुराधा चौहान'सुधी'✍️

Saturday, June 4, 2022

तपती वसुंधरा


 मानव बना विनाशक बरती न सावधानी।
यह आपदा बनी अब लीले नदी निशानी॥

सूखे तड़ाग सारे धरती चटक रही है।
यह क्रोध भाव कैसा क्यों बैर नीति ठानी॥

तपती वसुंधरा भी अम्बर निहारती है।
बरसो जरा झमाझम आये घड़ी पुरानी॥

नव पौध रोप कर हम धरती बचा सकेंगे।
जीवन फले धरा पर यह रीत भी निभानी॥

नयना निहारते है प्यासा उड़े पपीहा।
छाए घना अँधेरा बहती पवन सुहानी॥

शीतल समीर छेड़े संगीत जब धरा पर।
घिरती घटा घनेरी अंतस समेट पानी॥

मन झूमते सुधी फिर मुख से हटे निराशा।
बूँदे गिरे टपाटप कहती नई कहानी॥
अनुराधा चौहान'सुधी'✍️
चित्र गूगल से साभार

जीवन चक्र

चमक रहा अम्बर पर नवीन तारा है।
कहीं मिटा धरती से किया किनारा है॥

घटे बढ़े यह जीवन सदैव ऐसे ही।
मरे जिए अरु जन्में प्रवास सारा है॥

प्रताड़ना इस सच की सहे सदा मानव।
विछोह कंटक जैसा सहे बिचारा है॥

अधीर हो मन बैठा पुकारता उसको।
चला गया तन से जो अपार प्यारा है॥

समेट लो अब अंतस प्रकाश यह अपने।
चले चक्र नव प्रभु से प्रबंध न्यारा है।
*अनुराधा चौहान'सुधी'*

Wednesday, June 1, 2022

प्रहरी हमारे

ऊँचा लिए तिरंगा हम थाम के चलेंगे।
यह मान देश का है हम शान से कहेंगे॥

वीरों भरी धरा पर जयघोष गूँजता जब।
झुकता नहीं हिमालय हम भी नहीं झुकेंगे॥

हो रात भी घनेरी अरि घात हो लगाए।
जयघोष भारती का सुनकर सदा डरेंगे॥ 

माता धरा हमारी हम प्राण वार देंगे।
तन से लहू बहे पर हम वार भी करेंगे॥

सुन लो वसुंधरा के सच्चे सपूत सैनिक।
यह धूप में खड़े हो हर वार भी सहेंगे॥

कितनी घनी घटा हो या चंचला डराए।
प्रहरी बने हमारे जय भारती कहेंगे।

कहती सुधी चलें जब यह ओढ़ कर तिरंगा।
तब देख यह विदाई बस अश्रु ही बहेंगे।

*अनुराधा चौहान'सुधी'✍️*
चित्र गूगल से साभार