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Monday, January 10, 2022

मुस्कुराती भोर


मुस्कुराती भोर आकर
जब धरा का मुख निहारे।
लौटती लेकर निशा तब
साथ अपने चाँद तारे।

गूँजते आँगन हँसी से
बर्तनों की थाप सुनकर।
अरगनी पर सूखते फिर
स्वप्न नूतन नित्य बुनकर।
पायलों की छनछनाहट
गुनगुना आँगन बुहारे।।
मुस्कुराती भोर.....

आस पंछी सी चहकती
देख खिलता नव सबेरा।
धूप का टुकड़ा खिसक कर
पोंछता मन का अँधेरा।
माँग सिंदूरी लजाकर
रूप दर्पण में निहारे।
मुस्कुराती भोर.....

मुस्कुराती डालियाँ जब
प्रीत पुरवा खिलखिलाती।
सज उठी वेणी कली फिर
लग रही जैसे लजाती।
चूड़ियों की खनखनाहट
नाम बस पी का पुकारे।
मुस्कुराती भोर......
*अनुराधा चौहान'सुधी'स्वरचित

चित्र गूगल से साभार

20 comments:

  1. बहुत ही सुंदर सृजन।
    सादर

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    1. हार्दिक आभार आदरणीया

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  3. बहुत सुंदर! श्रृंगार से श्रृंगारित सरस भाव प्रकृति से सुशोभित अभिनव नव गीत सखी।
    सस्नेह।

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  4. वाह अनुराधा जी, हम सबकी भोर में आपने मुस्कराहट भर दी है !

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय।

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  5. वाह बेहतरीन सृजन

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    1. हार्दिक आभार भारती जी।

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  6. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया

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  7. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया दी।

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  8. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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  9. वाह! बड़ी मोहक रचना। बधाई और आभार!!!

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    1. हार्दिक आभार आदरणीय।

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  10. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीया

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