मिट जाती बस्ती पल-भर में
और सपने हो जाते धुआँ-धुआँ
मिट जाती ख्वाहिशें गरीबों की
खड़ा हो जाता इमारतों का जहाँ
कुछ दिन मचाते खींचातानी
कुछ दिन ही होती मारामारी
देखकर रह जाते स्वाहा सपने
मिट जाते दिल के सब अरमान
चिंता में सुलगती जर्जर काया
न सिर पर छत न कोई छाया
न बनता कोई मसीहा इनका
न कोई खेवनहार ज़िंदगी का
करते फिर से मेहनत-मजदूरी
मरी ख्वाहिशों को करके दफ़न
बस यही ज़िंदगी है गरीबों की
मरने पर नसीब न होता कफन
***अनुराधा चौहान***






