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Friday, May 31, 2019

नौतपा का प्रहार

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जेठ दुपहरी की तपन,नौतपा का प्रहार
विपदा यह सबसे बड़ी,करते हाहाकार
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तन जलावे धूप बड़ी,लू का तीखा वार
कैसे यह विपदा टले,प्रभू लगाओ पार
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जल संकट से हर तरफ, मच रहा कोहराम
करो सूर्य उपकार तो,मिल जावे आराम
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कुम्हलाय पेड़ पौधे,संकट बढ़ता अपार
वर्षा के दिख जाए अब,थोड़े से आसार
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***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Thursday, May 30, 2019

काश तुम होते

सोचती हूँ अक्सर तन्हाई में
काश वो लम्हा न जिया होता
जिस लम्हे में साथ छूटा था तेरा
काश वो रात न आई होती
तो मेरी ज़िंदगी से तेरी विदाई न होती
काश वो सफ़र न तय किया होता
जिसमें तुमसे दूर जाना लिखा था
यह "काश,अगर,यदि" ने साथ छोड़ा होता
तो शायद इस दर्द से बाहर निकल पाते
पर काश ऐसा हो सकता
तो इन दर्द भरी यादों को भूलना आसान होता
जेठ दुपहरी-सी तपती तेरी यादें
विरह की आग में मन को जलाती
काश तुम गए न होते तो
देखते कुछ नहीं बदला सब-कुछ वही है
अगर कुछ कमी है तो वो तेरी कमी है
काश मान जाते तुम सबका कहना
मगर तुम को जिद्द थी जाने की कैसी
एकबार भी न
सोचा जाने से पहले
उस लम्हे को रहेंगे सदा हम कोसते
काश रोक पाते तुमको पर मजबूर थे हम
किस्मत के फ़ैसले से नाखुश थे हम
काश टल जाती मौत आने से पहले
तो आज़ ज़िंदगी में तेरी कमी न खलती
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Tuesday, May 28, 2019

प्रदूषण का दानव

प्रदूषण बना दानव
लील रहा है शुद्ध हवा
घोल रहा उसमें जहर
नदियों की निर्मल धारा छीन
धकेल रहा दलदल की ओर
प्रदूषण के भय से हो रहा
पर्यावरण असंतुलित 
ओजोन परत छलनी हो रही
बदले हैं मौसम ने मिज़ाज
प्रदूषण के दानव से अब
काँप उठी है धरा 
ग्लेशियर पिघलते हुए
अपना अस्तित्व खो रहे
कट रहे हैं जंगल
पक्षी बनते जा रहे इतिहास
प्रदूषण के दानव से
कब तक बचने का करोगे प्रयास
धकेल रहे हैं हम खुद
खुद इस महादानव की और
इसकी गिरफ्त में आकर
भूलें सब दुनियादारी
सुख-सुविधाओं के नाम पर
खुद बुलाई अपनी बरबादी
अब शायद ही कभी
आएगा शुद्ध हवाओं का दौर
और कभी पहले जैसी सुहानी भोर
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Monday, May 27, 2019

ज़िंदगी एक चक्रव्यूह

एक पहेली के जैसी लगती है
 ज़िंदगी भी कभी-कभी
जितना सुलझाना चाहो
उतना ही उलझती जाती है
कभी मखमली अहसास देती
उड़ने लगती है आसमान में
खूबसूरत रंग भरने लगती 
तो कभी धरातल पर लाकर
अपनी सच्चाई दिखाती है
थक जाती है ज़िंदगी भी
दायित्वों का निर्वाह करते
चाहती कुछ पल शांति के कहीं
पर कहाँ मिलता है आराम
मौत से पहले ज़िंदगी में
परिस्थितियों से मजबूर हो
जुटे रहते हैं सब काम में
कुछ ऐसे लोग भी हैं यहाँ
जिन्हें तलाश है काम की 
पर फ़िर भी कोई काम नहीं मिलता
ज़िंदगी इतनी सरल कहाँ है 
चक्रव्यूह-सा रचती रहती है
यह ज़िंदगी सबके इर्दगिर्द 
हम अभिमन्यु की तरह 
लगे रहते हैं भेदने मुश्किलों को
तब तक उमर बीत जाती है
ज़िंदगी चल देती है मौत की गली
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Saturday, May 25, 2019

जीवन की पारी


ज़िंदगी के खेल में
कभी हारते कभी जीतते
देखें जीवन के रंग अनेक
जन्म लेता है मानव
जीवन की पहली पारी में
असहाय सा पड़ा
कभी रोकर कभी हँसकर
अपने भावों को व्यक्त करता
खिलौने की तरह
कभी इस गोद कभी उस गोद
प्यार के साए में बढ़ता
थोड़ा बड़ा होते ही
दूसरी पारी शुरू होते ही
जुड़ने लगती माँ-बाप की इच्छाएँ
कंधों पर बस्ते का बोझ
बचपन कहीं गुम होने लगता
प्रथम आने की सबको आस रहती
तीसरी पारी में
मंज़िल की तलाशते
सपनों को पूरा करने
निकल पड़ते घर से दूर
तकलीफों को सहकर सफल होते
घर बसाकर जीवन की नई शुरुआत करते
चौथी पारी में
अपने सपने तो कहीं दफ़न हो जाते
बच्चों की ख्वाहिशें पूरी करने में
माता-पिता को खुश करने में
रिश्तों को टूटते हुए देख 
खुद को हारता महसूस करते
अंतिम पारी में
एक बार फिर असहाय से पड़े
कभी रोकर कभी हँसकर
अपने भावों को व्यक्त करते
कभी प्यार कभी तिरस्कार सहते
एक बोझ के जैसे 
जीवन को लगते हारने
ज़िंदगी के खेल निराले होते हैं
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, May 22, 2019

जीवन नैया

विचारों के गहरे सागर में
गोते खाती जीवन की नाव
अंतर्मन में उठते सवालों के
थपेड़ो से डूबती-उतराती

कभी खुशियों के किनारे लगती
कभी मन के झंझावातों में फस
वहीं गोल-गोल घूमती रहती 
आस नहीं छोड़ती तूफ़ानों से लड़ती

लालसा की लहरों के बीच
जिजीविषा डोलती रहती
संतोष का किनारा पकड़ने की
हरदम नाकाम कोशिश करती

पल-पल सुलगती रहती
अथक परिश्रम कर के भी 
जिजीविषा खुशी के पल ढूँढती
पूरा न होने पे हताशा झेलती

विचारों के सागर से मुक्ति कहां मिलती
एक के बाद एक लहरें टकरातीं
फिर फँसकर मौत के भंवर में
हताश हो जीवन नैया टूटकर बिखरती
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

रहस्यमयी गलीचे

सुनहरे अश्वो पर सवार हो
सिंदूरी गलीचे पर चलके
सूर्य आया रश्मियों के साथ
जीवन में उजाला भरने

बिखरी हुई रश्मियों ने
छुआ ज्यों ही कलियों को
उतार ओस का घूँघट
हँसी कलियाँ तितलियों को

भोर का सुखद अहसास लिए
चहक उठा जीवन भी
निकल पड़े सब घर से
ज़िंदगी जीने अपनी-अपनी

बिछाए सुनहरा गलीचा
देते दिनकर जीवन की धूप
शाम को समेटकर उजाला
क्षितिज के छोर पर गया छुप

बिछ गई अँधेरे की चादर
रात आई ख्व़ाबों को लेकर
चाँद मुस्कुराया आसमान में
तारों का गलीचा बिछाकर

चमचमाती हुई चाँदनी
अँधेरे से रातभर लड़ती
सुबह सवेरे थककर चूर
चाँद से लिपट सो जाती

सूर्य उदय की पुनः तैयारी
कर रथ पे सवार हो आता
इस दिन-रात के फेर में
ज़िंदगी चलती अपनी धुन में

समय का चक्र भी चलता रहता
रहस्यमयी गलीचों से गुजर
ज़िंदगी भी चलती रहती है
इन गलीचोें पर कुछ खोजती

***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार