बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
कदम-कदम पे विपदा घेरे
राह है काँटों भरी।
छिन गया है सुख-चैन सारा
फिर रहे बेसहारा।
भूख-प्यास से व्याकुल होते
मिला न कहीं सहारा।
रोग कोरोना बढ़ रहा है
देख आत्मा भय भरी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
पग में छाले बहुत पड़े हैं
दूर है मंजिल अभी।
बहता लहु दिल देख रो रहा
छोड़ेंगे न घर कभी।
सोच मजदूर चले अकेले
अँखियाँ नीर भर डरी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
रेत पर बने पदचिह्न सारे
कह रहे हैं कहानी।
कुचलते हैं सपने सुनहरे
कैसी ये मनमानी।
नौनिहाल बेदम से चलते
प्राण परवाह न करी।
बड़े जतन से भरी हुई थी
छलक पड़ी सुख गगरी।
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार






