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Thursday, September 10, 2020

कैसा सावन

कैसा सावन बिन भैया के
चुभती है शीतल पुरवाई।
छूट गया पीहर कब पीछे
जग ने कैसी रीत बनाई।

सावन का झूला जब देखा
पीर नीर बन के झरती थी।
लिखने बैठी तुझको पाती
यादें बचपन की भरती थी।
झूला छूटा गुड़िया छूटी
बहना भी अब हुई पराई।
कैसा सावन बिन भैया के
चुभती है शीतल पुरवाई।।

रंग-बिरंगी रेशम डोरी
मैंने दिल की हर आस बुनी।
व्याकुल नयना बाट निहारें
तेरी कहीं न आवाज सुनी।
सुन भाई यह रक्षाबंधन
बिन तेरे लगता दुखदाई ‌।
कैसा सावन बिन भैया के
चुभती है शीतल पुरवाई।।

बँधी हाथ में रेशम डोरी
पर्व बड़ा पावन मनभावन।
बहना राखी लिए हाथ में
भीग रहा है यादों में मन।
पीर हृदय की बढ़ती जाती 
बहना की आँखें भर आई।‌।
कैसा सावन बिन भैया के
चुभती है शीतल पुरवाई।।
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

Saturday, September 5, 2020

ताने-बाने

राज कई जीवन से लेके
बुनती हूँ ताने-बाने।
आस पिरोती माला बुनती
सपने जाने पहचाने।

भाव उमड़ते कभी बिगड़ते
एक नया आकार लिए।
झूठी इस जीवन माला ने
रूप कई साकार किए।
मौन जगत की भाषा की क्या
बेचैनी कोई जाने।
राज कई.....

नहीं खनकती हैं अब चूड़ी
सुन बसंत की आवाजें।
सावन भी अब रौनक खोता
द्वेष भरे बजते बाजे।
खुशियों पर दिखावटी परतें
बात सभी अब ये माने।
राज कई.....

प्रेम प्यार की भाषा भूले
यह मेरा है वो तेरा।
प्रीत भरी माला भी बिखरी
छलिया सा ओढ़ चेहरा।
मुख पर मीठी वाणी बोले
पीछे से देते ताने।
राज कई.....
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

Sunday, August 30, 2020

नारी बिन संसार अधूरा

सूनी कोख लिए चुप सिसके
बैठी कोने बनी वियोगी।
आँचल माँ का सूना करते
बने हुए हैं कैसे रोगी।

सपने कितने नयन बसाए
हाथों से वो वस्त्र सिली थी।
ममता से सहलाती हर पल
मन को कितनी खुशी मिली थी।
अभी कोख में करवट ली थी
टुकड़े होकर रोई होगी।
सूनी कोख.....

एक फूल की आशा लेकर
जीवन में बस काँटे बोते।
आँगन की कलियाँ को फेंके
खुशियों को जीवन से खोते।
कुरीतियों की भेंट चढ़ी वो 
कैसे माँ कष्टों को भोगी।
सूनी कोख.....

बिना कली कोई फूल बना
इतनी मानव को समझ नहीं।
यही सृष्टि की बनी रचियता
जीवन का है कटु सत्य यही।
नारी बिन संसार अधूरा
बने फिरेंगे फिर सब जोगी।
सूनी कोख.....
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

Friday, August 28, 2020

ढलती शाम

 कुछ करले बातें हम अपनी
यह जग रैन बसेरा है।
कब टूटे साँसों का बंधन
उठ जाए ये डेरा है।

बीत गए हैं कितने सावन
कितने ही मधुमास गए।
क्यों सोचे उनके बारे में 
जो हमको ही भूल गए ।
अब ये पल हम दोनों के है
किस चिंता ने घेरा है।
कुछ कर ले...

बीत रही जीवन की संध्या
दिन अपनों पे वार दिए।
बची हुई गिनती की साँसे
चल हाथों में हाथ लिए।
सब पर खुशियाँ खूब लुटाई
बचा साथ अब तेरा है।
कुछ कर ले....

सुलझाते जीवन की दुविधा
आज कहाँ हम आ बैठे।
जिन्हें लगा रखा सीने से
वो कितने बैठे ऐंठे।
छोड़ पुराने दुख को पीछे
पकड़ हाथ बस मेरा है।
कुछ कर ले.....
***अनुराधा चौहान'सुधी'***

Monday, August 24, 2020

समय की चाल

समय बदलता कैसी चालें
देख हृदय से पीर झरे।
खोल रही हूँ याद पोटली
नयन नीर की धार गिरे।

कैसी जग की रीत रही है
चमक-धमक में सब उलझे।
तन की सुंदरता ही देखी
गाँठ नहीं मन की सुलझे।
ढके दिखावे की चादर में
कौन कहाँ अब दुख हरे।
समय...

आहट सुनके पीछे देखूँ
पहचाने सब लोग दिखे।
मुख मुस्काती परत चढ़ी है
अंदर बसा न झूठ दिखे।
बदल गई है रीत प्रीत की
मतलब की सब बात करे।
समय...

कल तक जो पीछे चलते थे
दूर दिखाई देते हैं।
चाल चली जीवन ने कैसी
देख कोई न चेते है।
रंग ढंग बिगड़े हैं सबके
कैसे भव से पार तरे।
समय......
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

आस उजाले की

 

भावों के अथाह सागर में
दिल की नैया क्यों खाली है।
सहसा ही जब आँख खुली तो
लगा साँझ होने वाली है।

ढलते-ढलते दिन कहता है
आस उजाले की मत छोड़ो।
सूरज जैसे रहो चमकते
 नित ही समय के संग दौड़ो।
चाँद गगन में चढ़ता देखो
अम्बर से ढलती लाली है।
भावों..... 

बीत रहा है हर क्षण जीवन
खुशियाँ आकर द्वार खड़ी।
स्वप्न महल के रहे सोचते
बीत रही अनमोल घड़ी।
गहरे सागर बीच डोलती
नौका मन की खाली है।
भावों.....

बीत रहे हैं दिन बसंत के
पतझड़ पीछे झाँक रहा।
कर्म करो मत रुको हारकर
तेज गति से समय बहा।
 आशाओं की बारिश लेकर
महक रही हर डाली है
भावों..... 
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार

Wednesday, August 12, 2020

मर्यादा के बाँध

विश्वास सदा मन वास करे
आशा के दीप जलाना।
फैलाना जग में उजियारा
अँधियारा दूर भगाना।

कंटक पथ पे वीर चले थे
मन भारत की शान लिए।
कड़ी चुनौती से टकराए
कभी नहीं भयभीत जिए।
अपनी धरती का मान बढ़े
यही राह है दिखलाना।
विश्वास....

वीर सपूतों की जननी ने
पग पग पे संग्राम सहे।
जात पात के झगड़े लेकर
मर्यादा के बाँध ढहे।
जात पात के बंधन तोड़ो
सीख यही है सिखलाना।
विश्वास...

कुंठा मन में वास करे तो
सद्भावों को खाती है।
आपस में मानवता लड़ती
प्रीत खोखली जाती है।
कष्ट सही रोई जब जननी
वीर ढाल बन के आना।
विश्वास...

सदमार्ग पर आगे बढ़ना
निर्बल को संबल देना।
उन्नत भारत की जय गूँजे
सकल विश्व में प्रण लेना।
पाँचजन्य सी शंख नाद कर
वीर भारती बढ़ जाना।
विश्वास....
***अनुराधा चौहान'सुधी'***
चित्र गूगल से साभार