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Thursday, January 14, 2021
मौका मिले न बार बार
Wednesday, January 13, 2021
चीखकर कहती कलम
छीन हाथों से किताबें
आज भी करते विदाई।
पीर बेटी जब सुनाती
रीति की देते दुहाई ।
चीखकर कहती कलम यह
पीर कब समझे जमाना।
रीतियों के जाल......
एकजुट होकर चलें अब
आँख पट्टी खोलनी है।
बंद हो शोषण सभी अब
बात सबको बोलनी है।
बोझ बनी कुरीतियों को
आज है जड़ से मिटाना।
रीतियों के जाल.....
अधिकार से वंचित कभी
कोई न अब बेटी रहे।
मान उसको भी मिले फिर
हर्ष की यह गाथा कहे।
संचालिका यह सृजन की
सीख ये सबको सिखाना।
रीतियों के जाल......
©® अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️
चित्र गूगल से साभार
Monday, January 11, 2021
झूठ का अस्तित्व
चित्र गूगल से साभार
Saturday, December 19, 2020
भूल गए वो
Tuesday, December 15, 2020
चित्र से आभास तेरा
Thursday, December 10, 2020
लोभ बिगाड़े संरचना
Sunday, December 6, 2020
कब जाने
जबसे दुनिया में आँख खुली
जन्म का मतलब भी न समझा
चाहतों के बोझ तले
दब गया जीवन का सपना
पल हरपल पल-पल भाग रहा
कुछ सोया सा कुछ जाग रहा
सफर ज़िंदगी का अनवरत
आकांक्षाओं के जन्म से त्रस्त
कुछ टूटे सपनों के भ्रम से
कहीं थके कदम बढ़ती उम्र से
कभी रुके,कभी बेहाल हुए
कभी सच्चाई से दो-चार हुए
ढलते दिन और अनगिनत बातें
बीत गईं जाने कितनी रातें
कब सुनी थी याद नहीं लोरी
टूूूट रही साँसों की डोरी
गुम हुए जीवन के मोती
आँखों की बुझती है ज्योति
कल जन्में आज मरेे
जैैसे शाख से फूल झरेे
आशाओं के सावन से
कब रस बरसे मनभावन से
समय चक्र के चलते-चलते
जीवन के पल रहे ढलते
रह जाते बस शिकवे गिले
इंसान कब शून्य में जा मिलेे
©®अनुराधा चौहान स्वरचित ✍️
चित्र गूगल से साभार






