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Tuesday, August 21, 2018

आँखों ही आँखों में

रेत के घरोंदों से
बिखर जाते हैं सपने मेरे
जब तुम पास होकर भी
पास नहीं होते हो
कभी आँखों ही आँखों में
समझ लेते थे
जो दिल की बातें
आज जुबां से कहूँ
फिर भी नहीं समझते
कभी हाथों में हाथ थाम कर तेरा
खुली आँखों से देखे थे जो सपने
आज आँखें बंद करूँ
तो कोई नजर नहीं आते
बीत रही है उम्र इस बेरुखी में तेरी
कब छीन ले मौत यह जिंदगी हमसे
आ दो घड़ी बैठ पहलू में मेरे
फिर से आँखों ही आँखों में
करले कुछ दिल की बातें
***अनुराधा चौहान***

16 comments:

  1. वाह खूब उकेरा है बेरुखी का दर्द आंखों ने उम्दा मित्र जी।

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  2. आँखों आँखों में दिल की बात कर लें ...
    प्रेम है अगर तो उससे मुलाक़ात कर में ...
    बहुत भावपूर्ण लिखा है आपने ...

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    1. बहुत बहुत आभार आदरणीय आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए

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  3. बहुत एवं भावपूर्ण रचना।

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  4. बहुत सुन्दर, मार्मिक व संवेदनशीलता से पूर्ण रचना .
    हिन्दीकुंज,हिंदी वेबसाइट/लिटरेरी वेब पत्रिका

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  5. बेरुखी ....सम्वेदनात्म्क भाव

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  6. बहुत सुन्दर रचना ....बहुत खूब 👌👌👌

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    1. बहुत बहुत आभार नीतू जी

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  7. बेरुखी के दर्द को उकेरती भावपूर्ण रचना

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  8. बहुत बहुत आभार श्वेता जी मेरी रचना को साझा करने के लिए 🙏

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  9. बहुत भावपूर्ण लिखा है आपने ...

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    1. धन्यवाद आदरणीय आपकी सार्थक प्रतिक्रिया के लिए 🙏

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