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Sunday, December 2, 2018

छाई हुई धुंध है

गहन है अंधकार
छाई हुई धुंध है
अजीब सी ख़ामोशी
विचारों का द्वंद है
भेदती इस
ख़ामोशी को
आवाज़ें गहरी 
सांसों की
मौन में भी 
पसरी है
कोई कहानी
गहरे ख्यालों की
आसमां है टूटते 
तारे को देख मौन
हम टूट कर बिखरें
तो लगता है अब 
हमारा कौन
मन में उठतेे इन
विचारों का नहीं
कोई जवाब है
टूटकर बिखरना
गिर कर संभलना
जिंदगी पथ पर
सुख-दुख अपार है
गहन अंधकार में
आज छाई धुंध है
होगा प्रकाश
कल खुला आकाश है
***अनुराधा चौहान***

6 comments:

  1. आसमां है टूटते
    तारे को देख मौन
    हम टूट कर बिखरें
    तो लगता है अब
    हमारा कौन
    मन में उठतेे इन
    विचारों का नहीं
    कोई जवाब है....
    बहुत ही सुंदर लिखा है आपने । इस सुख दुख के बीच ही खुला आकाश है। बधाई ।

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  2. बहुत ही सुन्दर रचना

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  3. भावात्मक प्रतीकों से सजी सुंदर रचना ।

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  4. भावनात्मक सृजन अनुराधा जी ।

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