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Wednesday, December 12, 2018

जिसके हम हों राजा-रानी

शिशिर की 
शीतल रातें
ढोलक पर 
पड़ती
जब थापें
मधुर मिलन के 
गीत गाती
गुजरिया 
झूम झूमकर 
नाचें
बातें प्रीत की 
करनी हैं बाकी
चाँद तारे बने 
हमारे साक्षी
क्यों सजनी 
तू शरमाए
चलो हम गीत 
मिलन के गाएं
ठंडी सर्द 
हवाओं में
सुंदर मस्त 
फिज़ाओं में
आ तुझको 
मैं प्यार करूं
आ तेरा 

श्रृंगार करूं
मैं ले आया 
यह सुंदर हार
जो बने तेरे 
गले का श्रृंगार
आ तुझको 
पहना दूं प्रिय
दिल का हाल 
सुना दूँ तुझे
यूं चुप न बैठो 
कुछ तो कहो
कुछ मेरे संग 
सपने बुनो
तू मेरी मैं 
तेरा प्रिय
कहीं बीत 

न जाए 
रैना प्रिय 
आ तुझको 
सीने से लगाकर
अपने दिल में 
तुझे बसाकर
आओ लिखे 
आज़ प्रेम-कहानी
जिसके हम हों 
राजा-रानी

***अनुराधा चौहान***(चित्रलेखन)

जिंदगी

कोई जब ज़िंदगी में 
खास होता है
उसका वक़्त पर 
एहसास नहीं होता
जब कहीं वो आंँखों से 
ओझल हो जाता है
तब अपनी गलती का 
एहसास होता है
ऐसे ही माता-पिता की 
अहमियत 
तब तक समझ नहीं आती
जब तक वो हमारी 
जरूरत पूरी करते रहते हैं
जब वो लाचार हो जातें हैं
या कभी अचानक
सिर से हट जाता 
पिता का हाथ
आश्वासन देने तो 
बहुत लोग हैं आते
पर साथ देने वाला 
कोई हाथ नहीं आता
तब होता है पिता की
अहमियत का एहसास
समय रहते करलो
हर रिश्ते की कदर
ज़िंदगी मौका देती है
तो धोखा भी दे जाती है
***अनुराधा चौहान***

Saturday, December 8, 2018

नारी है इसलिए अटल खड़ी है


आंखों में उसके चंचलता
बातों में उसके मोहकता
चलती है जब बल खाकर
लगती जैसे हो मधुशाला

हो स्वर्ग से उतरी हूर कोई
इतनी सुन्दर जैसे हो परी
दिल ममता से भरा हुआ
आंखों में दर्द है कहीं छुपा

तन से कोमल मन से कोमल
चंचल चितवन जैसे कमल नयन
गाल गुलाबी फूलों जैसे
फिर भी चुभती सबको शूलों जैसी

नारी बिना कोई मर्द नहीं
फिर भी दिखता उसका दर्द नहीं
चंचल मन वो सबको दिखाती
अपनी मजबूरी सबसे छुपाती

कुदरत का वो अनमोल नगीना
जिसने की सृष्टि की रचना
सदियों से मन में चाह लिए
उसको भी पूरा मान मिले

औरत है नहीं कोई खिलोना
क्यों उसका सुख-चैन है छीना
देदो उसको भी अधिकार सभी
होंठों पर खिल उठे चंचल हंसी

अपने आत्मसम्मान की खातिर
लड़ती रही और लड़ती रहेगी
चंचल,ज्वाला दोनों रूपों में
नारी है इसलिए अटल खड़ी है
***अनुराधा चौहान***

Wednesday, December 5, 2018

रिश्तों के मायने


भीड़ कितनी भी हो मगर
पर तन्हाईयां रास आतीं हैं
होती है कुछ वेदना भरी 
स्मृतियां मन मस्तिष्क से 
नहीं निकल पातीं हैं
ऐसे ही जब कोई अपना
असमय ही साथ छोड़ जाता है
मन में सिवाय वेदना के 
कुछ भी नहीं रह जाता है 
इक क्षण में बिखर जाते हैं
रिश्तों के मायने टूट कर
द्वेष पाल कर बैठ जाते हैं
वेदना पहुंचाने मेंं अक्सर
जीवन में कई मोड़ लेकर
आते हैं जिंदगी के रास्ते
कहीं कहीं फूलों भरे हैं
कहीं भरे असंख्य कांटो से 
कभी कभी कह दी जाती है
कुछ बातें अनजाने में
एक पल भी नहीं सोचते हैं
हम उसे वेदना पहुंचाने में
लौटकर नहीं आती हैं
जो बातें ज़बान से निकले
मन ही मन तड़पातीं हैं
जो गर ख्याल से न निकले
क्यों खुद की खुदगर्जी में
इतना खो जाते हैं लोग
वेदना पहुंचाकर मन को
फिर हो जाते हैं मौन
कोशिश हर इंसान की
अपनेपन की होनी चाहिए
कभी भूले से न देना किसी को दर्द
वो इंसानियत होनी चाहिए
***अनुराधा चौहान***

गूंज उठी मधुर शहनाई

गूंज उठी मधुर शहनाई
सजी चूड़ियां गोरी की कलाई
चल दी गोरी पिया की गली
आंखों में ढेरों सपने लिए
होंठों पर ढेरों नगमे लिए
ओढ़ के प्रीत की चुनरी
मां की लाड़ली दुल्हन बनी
चल दी गोरी पिया की गली
नये रिश्तों में रचने बसने
प्रीत के रंग में खुद को रंगने
शहनाई सा मधुर मिलन हो
ज़ीवन की सुंदर सरगम हो
महक उठी मन की फुलवारी
बाबुल के आंगन की खुशियां चली
चल दी गोरी पिया की गली
जीवन की रीत यह कैसी
छूट गई डगर पीहर की
घड़ी बिछड़ने की अब आई
कानों में चुभने लगी शहनाई
आंखों में ढेरों आंसू लेकर
घर की खुशियां साथ लेकर
भाई-बहन सब पीछे छोड़कर
गूंजती शहनाईयों में
थाम साजन का हाथ चली
चल दी गोरी पिया की गली
***अनुराधा चौहान***

Monday, December 3, 2018

साया साथ न छोड़ें


जब तक जीवन
चलता जाए
साया साथ न छोड़ें
जाने कितने रूप रंग में
जीवन में रंग जोड़े
पैदा होते ही मिला मुझे
माँ के आंचल का साया
लाड़ प्यार से जिसने
मेरा ज़ीवन है चमकाया
धीरे-धीरे बढ़े हुए तो
पिता बने फिर साया
जीवन की हर 
धूप-छांव में मुझको
चलना सिखाया
फिर मिला मुझे जीवन में
साया हमसफ़र का
बड़ा सुहाना बना दिया
सफ़र उसने जीवन का
खुद का साया
साथ तभी तक
जब तक यह जीवन है
साया रूठा जीवन टूटा
साया का भी जीवन है
***अनुराधा चौहान***

Sunday, December 2, 2018

छाई हुई धुंध है

गहन है अंधकार
छाई हुई धुंध है
अजीब सी ख़ामोशी
विचारों का द्वंद है
भेदती इस
ख़ामोशी को
आवाज़ें गहरी 
सांसों की
मौन में भी 
पसरी है
कोई कहानी
गहरे ख्यालों की
आसमां है टूटते 
तारे को देख मौन
हम टूट कर बिखरें
तो लगता है अब 
हमारा कौन
मन में उठतेे इन
विचारों का नहीं
कोई जवाब है
टूटकर बिखरना
गिर कर संभलना
जिंदगी पथ पर
सुख-दुख अपार है
गहन अंधकार में
आज छाई धुंध है
होगा प्रकाश
कल खुला आकाश है
***अनुराधा चौहान***