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Monday, September 17, 2018

बैचेनी का राज

कोई आकर्षण था
उसकी आंखों में
या कोई लगाव
उस अनदेखे चेहरे से
जब भी गुजरती मैं
उसकी गली से
खिड़की से झांकती
उसकी बैचेनी भरी आंखें
जैसे वो मेरा ही
इंतजार कर रहा हो
कोई राज छिपा था
उसकी आंखों में
अक्सर ठिठक जाते थे
मेरे कदम देखकर
उसकी आंखों को
कुछ कहना चाहती थी
पर कह नहीं पाई
कोई बंधन रोके था
अब जब नहीं दिखाई
देती मुझे उसकी आंखें
तो एक बैचेनी लिए
गुजरती हूं अब भी
उसकी गली से मैं
इस इंतजार में शायद
फिर नजर आ जाए
छिपकर देखती आंखें
तो इस बार पूछूंगी
उसकी बैचेनी का राज
***अनुराधा चौहान***

12 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना ।

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  2. राज तो आँखें कह चुकी..
    सुंदर रचना.

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  3. बहुत सुन्दर रचना ...👌👌👌

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    1. बहुत बहुत आभार नीतू जी

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  4. बहुत सुन्दर रचना जी...

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  5. बहुत सुंदर रचना

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  6. बहुत सुंदरता से मन के उदगारों को प्रेसित करती रचना ।
    आंखों के राज, राज ना रहे
    कहीं दिल में गहरे उतर गये ।

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    1. आभार आपका कुसुम जी आपकी सार्थक प्रतिक्रिया हमेशा मेरा उत्साह बढ़ाती है

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  7. सुन्दर रचना

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    1. धन्यवाद आदरणीय राकेश जी

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