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Monday, February 24, 2020

पायल भी चुप रहती

दिन औ रातें पलछिन रहती
गिनती मीत,
पीर जलाये आज विरह फिर
बनती रीत।

रसभरे करे आज बहाने
मिसरी घोल,
फाँसों से चुभते हैं दिल में
कड़वे बोल।
छलता है मानव ही सबको
करके झोल,
छुपी हुई सच्चाई जैसे
कछुआ खोल।

पायल भी चुप रहती अभी न
गुनती गीत,
पीर जलाये आज विरह फिर
बनती रीत।

याद दिलाए पल-पल पुरवा
चली बहकर,
भँवरो की गुँजन को सहती
कली हँसकर।
अँधियारे क्यों डूबे ज़िंदगी
कभी डरकर,
उमड़-घुमड़ आशा की बदली
चली भरकर।

विश्वास नींव सदा टिकती है
सच्ची भीत,
पीर जलाये आज विरह फिर
बनती रीत।।
***अनुराधा चौहान***
चित्र गूगल से साभार

11 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 25 फरवरी 2020 को साझा की गई है...... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. फाँसों से चुभते हैं दिल में
    कड़वे बोल।
    छलता है मानव ही सबको
    करके झोल,
    छुपी हुई सच्चाई जैसे
    कछुआ खोल।
    लाजवाब भावाभिव्यक्ति अनुराधा जी ।

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  3. बेहतरीन सृजन सखी ,सादर नमन

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  4. वाहह सखी!!!बहुत सुन्दर नवगीत👏👏👏👏👏

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  5. वाह सखी बहुत सुंदर।

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  6. सुंदर कोमल भाव लिए सरस नव गीत ।
    बहुत बहुत सुंदर सखी।

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  7. बहुत सुंदर सृजन,अनुराधा दी।

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  8. Replies
    1. हार्दिक आभार आदरणीय

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